शोर-शराबे को भूलकर ,
अपने को...
तक़दीर के भरोसे छोड़कर,
क्या...
तुमने पाया ?
क्या...
हमने खोया ?
ज़मीन पर लक्ष्मण रेखा खींचकर ,
दुनिया को टुकड़ों में बांटकर ...
क्या...
तुमने पाया ?
क्या...
हमने खोया ?
इन्द्रधनुष को सात रंगों,
किसने बांटा ?
काले-सफ़ेद को दुनिया में,
क्यों पाटा ?
ये तेरा ,ये मेरा...
किसने बुना ये ताना-बाना..............................
वेदांश.....
रिश्तों की मुक़र्रर सजा की सुनवाई है आज ,कुछ दलीलें इस तरफ से हैं और कुछ उस तरफ से,गवाहों की कहीं कोई कमी न पड़े यही तो कोशिश है सबकी . कठघरे में खड़ा है थोड़ा सच और थोड़ा झूट !शक्ल अलग है पर है वही .आज फिर लगेंगी बाजियां वही मोहरे होंगे ,वही प्यादे होंगे .तमाशे देखेगा खड़े हो वजीर और ये बादशाह होगा अपनी ही जुस्तजू में ................
फ़रवरी 16, 2010
फ़ासले.....
ज़िन्दगी को बाज़ी समझकर,
सबने किये सौदे....
कुछ तुमने , कुछ हमने,
फ़र्क क्या था ?
वक़्त बदला था, या बढे थे फ़ासले ?
वक़्त तो वहीं है...
बस,
बदले हम और तुम,
फिर बढ़े फ़ासले...
कभी तुम पीछे हटे,
कभी ! हम आगे बढ़े,
एक-एक कदम से बने थे,
फ़ासले....
मीलों पीछे आकर,
क्या ? मिट पाते ये
फ़ासले....
अब तो बढ़ना होगा ,
हमको...
एक कदम तुम ,और
एक कदम हम...
वेदांश......
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी के सफ़र में ,
ख़्वाबों की तामीर में,
रिश्तों की रुसवाई में,
और
अपनों के बीच तन्हाई में,
खुले मुंह दफ़न होती हैं ,
कई सिसकियाँ ....
सन्नाटों के इस शहर में ,
उठती है अक्सर एक आवाज़,
जिसे कायनात भी अपने में समेट न सकी,
पल-पल बनते औ मिटते निशां.....
हर घड़ी खत्म होता जहाँ का वज़ूद ,
और ख़ुद को पते हम एक नए जहाँ में ,
कभी उम्मीद और नाउमीद से मोलभाव करते ,
कभी ख़ुद का वज़ूद तलाशते .....
वेदांश....
ख़्वाबों की तामीर में,
रिश्तों की रुसवाई में,
और
अपनों के बीच तन्हाई में,
खुले मुंह दफ़न होती हैं ,
कई सिसकियाँ ....
सन्नाटों के इस शहर में ,
उठती है अक्सर एक आवाज़,
जिसे कायनात भी अपने में समेट न सकी,
पल-पल बनते औ मिटते निशां.....
हर घड़ी खत्म होता जहाँ का वज़ूद ,
और ख़ुद को पते हम एक नए जहाँ में ,
कभी उम्मीद और नाउमीद से मोलभाव करते ,
कभी ख़ुद का वज़ूद तलाशते .....
वेदांश....
वज़ूद
ज़बान से ज़ख्म खाए हैं,
हमने...
खंज़र क्या बोल पायेगा...
हर नज़र ने जलाया है ,
रोशन आग...
क्या ? बुझा पायेगी,
यादों के सैलाब उमड़ते हैं ,
इस दिल में ...
क्या आंधी , क्या तूफ़ान..
वज़ूद मिरा मिटा पाएंगे ....
वेदांश....
हमने...
खंज़र क्या बोल पायेगा...
हर नज़र ने जलाया है ,
रोशन आग...
क्या ? बुझा पायेगी,
यादों के सैलाब उमड़ते हैं ,
इस दिल में ...
क्या आंधी , क्या तूफ़ान..
वज़ूद मिरा मिटा पाएंगे ....
वेदांश....
सौदे...
यहाँ-वहां , इधर-उधर...
है परेशानी का सबब ,
ज़िन्दगी के इस सफ़र में ,
ख़्वाबों की तामीर को ,
तराज़ू में तोलकर...
हर कोई कर रहा है ,
सौदे...
मैंने भी किये,
और
कर रहा हूँ ...
अल्फाज़ों को बेच,
खुशियाँ खरीदी ....
वहीं कुछ ,
नगमे भी खरीदे,
ग़मों को बेच....
वेदांश......
चीखो.......चिल्लाओ...............
आगे निकल आये हम ...
कितने ?आगे निकल आये हम ,
रिश्तों को छोड़ , दोस्ती भूल ,
और कुछ वफ़ाओं को तोड़...
कुछ कर गुज़रने की चाह में ,
क्या ? पीछे छोड़ आये हम...
कितने ? आगे निकल आये हम ...
बची यादों को समेटने का ,
वक़्त भी तो न निकाल पाए हम ,
आंसू सूखे आँखों के ,लफ्ज़ भी
ज़बान में सिमट गए ...
काजल की कोठरी से भी ,
कोरे ही निकाल आए हम ...
वक़्त को कहाँ ? पीछे छोड़ आये हम ........
वेदांश....
रिश्तों को छोड़ , दोस्ती भूल ,
और कुछ वफ़ाओं को तोड़...
कुछ कर गुज़रने की चाह में ,
क्या ? पीछे छोड़ आये हम...
कितने ? आगे निकल आये हम ...
बची यादों को समेटने का ,
वक़्त भी तो न निकाल पाए हम ,
आंसू सूखे आँखों के ,लफ्ज़ भी
ज़बान में सिमट गए ...
काजल की कोठरी से भी ,
कोरे ही निकाल आए हम ...
वक़्त को कहाँ ? पीछे छोड़ आये हम ........
वेदांश....
मानव को कचोटती!
दिगदिगंत तक गूंजती,
एक आवाज़....
आवाज़,आदेश या
अनुगूँज...
अंतरिक्ष से आती,
अनन्त में समा जाती..
कोई ? समझ न पाता,
क्या ?
कोई ? समझ न
पाया,नहीं !
समझ गए वे,
जिनमे थी ,
समझ...
समझ,उतावलापन
या फिर ,
पागलपन....
समझ गए थे,
आइन्स्टीन,विवेकानंद और
अरस्तु ...
और
रची एक नयी श्रृष्टि ,
जिसने दी हमे ,
दृष्टि ...
समझ जाते गर हम भी ,
तो....
हमारे हिस्से की आवाज़ भी,
यूँ ही...न समा जाती अनन्त में ...
और
हम भी होते आज,
मार्ग प्रणेता ....
वेदांश.....
दिगदिगंत तक गूंजती,
एक आवाज़....
आवाज़,आदेश या
अनुगूँज...
अंतरिक्ष से आती,
अनन्त में समा जाती..
कोई ? समझ न पाता,
क्या ?
कोई ? समझ न
पाया,नहीं !
समझ गए वे,
जिनमे थी ,
समझ...
समझ,उतावलापन
या फिर ,
पागलपन....
समझ गए थे,
आइन्स्टीन,विवेकानंद और
अरस्तु ...
और
रची एक नयी श्रृष्टि ,
जिसने दी हमे ,
दृष्टि ...
समझ जाते गर हम भी ,
तो....
हमारे हिस्से की आवाज़ भी,
यूँ ही...न समा जाती अनन्त में ...
और
हम भी होते आज,
मार्ग प्रणेता ....
वेदांश.....
नमन है ... दिव्यरूप,जगत्व्यापी माँ..

जिसमे सिमटा है पूरा जहाँ,
इस शब्द जैसा और.. कोई ?कहाँ?
प्यार है इसका चांदनी रात ,
लगता न ग्रहण उस प्यार में,
रहती हमेशा पूनम सी धवल छाया ,
दूधिया ज्ञान की रौशनी में ,इसके
बनती है एक इंसानी काया ,

रहता जिसका आशीर्वाद ,
बनकर हमारा साया ,
गंगा से भी निर्मल,पावन है,
जिसका आंचल.....
नयनों से बरसती है ममता,
क्या इंसान,क्या पशु...
सबका मन उसी में रमता,
है क्या?कोई भाग्यशाली हमसा ....
वेदांश...
सुकून ...........
नहीं रहा अब,वो सुकून ,
ज़ख्मों को कुरेदने में ,
यादों को सहेजने में,
टूटे शीशे जोड़ने में,
कुछ शर्तों को तोड़ने में,
और,
अपने साये को पीछे छोड़ने में...
हाँ गुरेज़ नहीं मुझे कहने से ,
ज़िन्दगी थी मेरी भी,
जैसे बिन पानी मीन,
पर,
कहने को हम भी आबाद थे ,इतने
न बर्बाद थे...
कुछ बेफ़िक्र से ,कुछ आज़ाद से ,
बंज़र टीले के मगरूर बादशाह से,
रोज़ो -शब्, शामो-सहर ..
रहती है एक ही ख़लिश दिल में,
काश न सुन पाते ,दिल की आवाज़....
वेदांश .....
ज़ख्मों को कुरेदने में ,
यादों को सहेजने में,
टूटे शीशे जोड़ने में,
कुछ शर्तों को तोड़ने में,
और,
अपने साये को पीछे छोड़ने में...
हाँ गुरेज़ नहीं मुझे कहने से ,
ज़िन्दगी थी मेरी भी,
जैसे बिन पानी मीन,
पर,
कहने को हम भी आबाद थे ,इतने
न बर्बाद थे...
कुछ बेफ़िक्र से ,कुछ आज़ाद से ,
बंज़र टीले के मगरूर बादशाह से,
रोज़ो -शब्, शामो-सहर ..
रहती है एक ही ख़लिश दिल में,
काश न सुन पाते ,दिल की आवाज़....
वेदांश .....
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