जनवरी 24, 2010

अर्थ का अनर्थ .......(गुमनामी एक पंथ,मज़हब या फिर ..........)

  परेशां हो खुद की दलीलों से ,
अपनों से बेगाना हो ,
बैठा जब इन पत्थरों पर,.
ख़ामोशी को सुना ,बेहोशी गंवाई ,सपने आए,
पर नींद न थी.............
सपने दो तरह के होते हैं ,एक वो जो नींद के साथ आते हैं ,और दुसरे नींद खत्म होने के बाद,मेरे ख्याल से इन दोनों में सिर्फ एक ही फर्क हो सकता है पहले में तुम डर सकते हो और दूसरे से तुम डरा सकते हो ...वैसे ये तो  बहुत ही बेतुखी बात है जो सिर्फ में ही कर सकता हूँ ........
अगर नींद पर पुराण जैसा कोई ग्रन्थ लिखा जाय ,तो मुझे पूरा भरोसा है कि वह एक नया इतिहास रचेगा ,इससे एक बड़ा नुकसान हो सकता है ,मेरी जमात के कई लोग बिलकुल मेरे जैसे ही इस ग्रन्थ को पढ़कर बड़े -बड़े वाइजों को मात दे सकेंगे,...ये भी मुमकिन हैं है एक नया ही पंथ शुरू हो जाय,सोच में ही सही मैं तो अभी से उस मज़हब का blueprint तैयार करने लग गया हूँ.अभी बहुत काम करने हैं,मज़हब का खाका तैयार करना है कुछ शर्तें तैयार करनी हैं,सबसे पहले तो ये ज़रूरी है कि मज़हब का नाम सोचा जाय ऐसे में मुझे एक महान आदमी का नाम याद आ रहा है, फिर मैं सोचता हूँ नाम में क्या रखा है इसीलिए उनके उच्च  विचारों को ही आप तक पंहुचा देता हूँ, वो ये कहकर मेरे छोटे से दिल में अपने लिए बड़ी सी जगह बना  गए  हैं कि ''अजगर करे न चाकरी पंछी  करे न काज,दास मलूका कह गए सबके दाता राम '' वाह क्या सोच है सबके दाता राम लेकिन मैं इतना कर्मठ तो हूँ ही कि एक आदमी के भरोसे नहीं बैठ सकता तो यहाँ पर राम कि जगह  कुछ विकल्ल्प  रख लेते हैं, मेरे लिए राम कि जगह कोई भी हो सकता है ,वो राम प्रसाद ये कोई भी राम हो सकता है ,..राम ही क्यों वो श्याम ,महेश,गणेश,दिनेश.... कोई भी हो सकता है या सब के सभी हो सकते हैं अब ये तो मैंने कह ही दिया है कि नाम मैं क्या रखा है,इसीलिए  इस मज़हब को गुमनाम ही रखना ठीक है या नाम गुमनाम रख देते हैं,...चलो नाम कि सरदर्दी ओह माफ़ करना गुमनाम कि सरदर्दी हटी ,तो अब से हम इसे गुमनाम मज़हब कहेंगे..
  वैसे इस नाम से फ़ायदा भी है,लेकिन एक परेशानी भी आ सकती है धर्म परिवर्तन की,एक गुमनाम मज़हबी बदनाम हो सकता है पर एक बदनाम मज़हब वाला हमारे गुमनाम मज़हब में नहीं नहीं आ सकता ,ये तो बड़ी ही दिक्कत वाली बात है लेकिन अभी इसे छोडिये जब होगा तब देखा जायगा,अभी गुमनाम मज़हब का blueprint तैयार करना ज्यादा जरुरी है ,एक मज़हब बहुत विस्तृत होता है ऐसा मैंने सुना है इसीलिए ज्यादा पन्ने ख़राब करने में लगा हूँ क्यों की हर मज़हब की branches की अलग value  होती है ,तो ऐसा शो करने के लिए पन्ने ख़राब करना ज़रूरी है ,आखिर इन से ही तो मंत्र,शलोक और सुवचन जैसी क्रियाएँ निकलेंगी ,जिनको सीखकर कई विद्द्वानों को रोज़गार मिलेगा ,आखिर एक मज़हब शुरू करते हुए मुझे तो ये सब सोचना ही पड़ेगा .....
      ये एक तरीके से संक्षिप्त सार है आगे ज़रूरत के हिसाब से पन्ने दर पन्ने ,अध्याय दर अध्याय जुड़ते जायंगे...........
                                                                                                                                          क्रमशः ........




   


     वेदांश 
    
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1 टिप्पणी:

Amit ने कहा…

A very good effort is seen to promote your write up's......All d best for future.....